दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने अनुकंपा नियुक्ति (compassionate appointment) को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यह सुविधा केवल जरूरतमंद परिवारों के लिए ही है, न कि सभी मामलों में स्वतः अधिकार के रूप में। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य ऐसे परिवारों को तत्काल सहारा देना है, जिनकी आर्थिक स्थिति मृत कर्मचारी की मृत्यु के बाद अचानक कमजोर हो गई हो। यदि कोई परिवार पहले से ही अपनी आजीविका अच्छी तरह से चला रहा है, तो उसे इस तरह की राहत नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि अनुकंपा नियुक्ति को सार्वजनिक रोजगार का वैकल्पिक माध्यम नहीं माना जा सकता। इसे किसी मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार के लिए लंबे समय तक चलने वाले रोजगार या स्थायी पुनर्वास का साधन बनाना कानून की मंशा के खिलाफ होगा।अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए औद्योगिक ट्रिब्यूनल का 2014 का आदेश रद्द कर दिया है। यह मामला बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड की याचिका से जुड़ा था, जिसमें कंपनी ने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें उसे एक मृत कर्मचारी के बेटे को अनुकंपा आधार पर नौकरी देने पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। मामले की सुनवाई जस्टिस शैल जैन की बेंच ने की। अदालत ने पहले दिए गए निर्णय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति केवल जरूरतमंद परिवारों के लिए एक राहत का साधन है, न कि रोजगार का सामान्य विकल्प। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह की नियुक्ति को स्थायी रोजगार का विकल्प या आर्थिक पुनर्वास का दीर्घकालिक साधन नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने ट्रिब्यूनल का वर्ष 2014 का फैसला निरस्त कर दिया
काम के दौरान करंट लगने से हुई थी मौत
यह केस एक मृत कर्मचारी के बेटे को अनुकंपा आधार पर नौकरी देने के निर्देश से संबंधित था। सुनवाई जस्टिस शैल जैन की बेंच ने की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की मांग करीब साढ़े 6 साल की बिना किसी उचित कारण देरी के बाद उठाई गई थी। कोर्ट के अनुसार, यह भी पाया गया कि उस समय परिवार किसी ऐसी तत्काल आर्थिक तंगी में नहीं था, जैसा कि अनुकंपा नियुक्ति योजना के तहत आवश्यक माना जाता है। मामले में मृत कर्मचारी पहले दिल्ली विद्युत बोर्ड में लाइनमैन के पद पर कार्यरत था, जिसकी सेवाएं बाद में BSES यमुना पावर लिमिटेड को हस्तांतरित कर दी गई थीं। अभिलेख के अनुसार, अगस्त 2003 में काम के दौरान बिजली का झटका लगने से कर्मचारी की मौत हो गई थी। इसके बाद परिवार को पारिवारिक पेंशन के साथ-साथ लाभों के रूप में 7 लाख रुपये से अधिक की राशि भी प्राप्त हुई थी
पूर्व आदेश का दिया हवाला
अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के हालिया निर्णय केनरा बैंक बनाम अजितकुमार जीके (2025) का उल्लेख किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल उन परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता देना है, जिन्हें कर्मचारी की मृत्यु के कारण अचानक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को आधार बनाते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति को नियमित रोजगार या स्थायी भर्ती का विकल्प नहीं माना जा सकता। इसका मकसद केवल तत्काल राहत देना है, न कि दीर्घकालिक रोजगार का अधिकार प्रदान करना।
7 साल बाद मांगी नौकरी
मामले के अनुसार, कर्मचारी की मृत्यु वर्ष 2003 में हुई थी, जबकि उसके बेटे ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए फरवरी 2010 में आवेदन किया था। कंपनी ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह योजना के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। इसके बाद विवाद इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल तक पहुंचा, जहां ट्रिब्यूनल ने कर्मचारी के बेटे के पक्ष में फैसला देते हुए कंपनी को उसके मामले पर योग्यता के आधार पर विचार करने का निर्देश दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इस आदेश को रद्द कर दिया। जस्टिस शैल जैन की बेंच ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति केवल तत्काल आर्थिक सहायता देने के उद्देश्य से दी जाने वाली एक अपवादात्मक व्यवस्था है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह व्यवस्था भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 के तहत सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर के सामान्य सिद्धांत का केवल एक अपवाद है। इसे किसी भी स्थिति में अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता।

